मुगलकालीन भू-राजस्व प्रशासन, विशेष रूप से बादशाह अकबर (1556-1605) के शासनकाल के दौरान, के संदर्भ में दस्तूर शब्द का प्रयोग विभिन्न फसलों के लिए निर्धारित नकद राजस्व दरों के मानक को संदर्भित करने के लिए किया जाता था। आर्थिक स्थिरता और कराधान में निष्पक्षता सुनिश्चित करने तथा राजस्व व्यवस्था को अधिक तर्कसंगत बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई इस व्यवस्था के तहत, भू-राजस्व का निर्धारण करने के लिए विगत दस वर्षों (1571-81) के औसत उत्पादन तथा इसी अवधि में उत्पादन के प्रचलित मूल्यों के औसत की गणना करने के पश्चात औसत मूल्यों को औसत उत्पादन से गुणा कर एक नकद राजस्व मांग (नकद राजस्व प्रति बीघा) परिकलित किया जाता था। इस प्रकार निर्धारित की गईं इन मानकीकृत नकद दरों को दस्तूर या दस्तूर-अल-अमल के रूप में जाना जाता था, जिन्हें कृषि परिस्थितियों और बाजार की कीमतों के आधार पर विभिन्न राजस्व मंडलों के लिए अलग-अलग तैयार किया जाता था।

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