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मध्यकालीन और प्रारंभिक आधुनिक काल के दौरान ग्रामीण महाराष्ट्र में विभिन्न कार्यों में ग्राम की सेवा करने वाले ग्राम सेवकों, जो मुख्यतः निम्न जातियों के कारीगर (कारू) होते थे, को बलूतादार कहा जाता था, और उनकी सेवाओं के बदले प्रत्येक कृषक परिवार से अनाज एवं अन्य कृषि उपज के रूप में उन्हें जो पारिश्रमिक प्राप्त होता था, उसे बलूत या बलूता कहते थे। इस पारिश्रमिक के अलावा  पर्वों एवं त्योहारों के अवसर पर उन्हें पका हुआ भोजन भी प्रदान किया जाता था।

महाराष्ट्र में मराठा शासन, विशेष रूप से पेशवा के शासनकाल में बलूतेदारी एक सुसंगठित तथा स्थायी व्यवस्था थी जिसमें कारीगरों की बारह जातियां शामिल थीं। वर्तमान में इसे बारा बलूतादारी के नाम से जाना जाता है। ग्रांड डफ के अनुसार, बारा बलूतादारी में शामिल जातियां थीं—सुतार (बढ़ई), लुहार, चंभर (मोची), महार (बोझा ढोने वाला), मंग (चमड़े की आपूर्ति करने वाला), कुंभर (कुम्हार), न्हावी (नाई), परित या पारित (धोबी), गुरव (पुजारी), जोशी (ज्योतिषी), सोनार या सुनार, और मुलाना (कसाई)। इन सभी जातियों को पुनः तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया था—थोराली कास (प्रथम), मघाली कास (मध्यम), या ढाकती कास (निम्न)।

बलूतादार दो प्रकार के होते थे—

(i)   वतनदार या मिरासी बलूतादार आनुवांशिक आधार पर अपनी सेवा देते थे अर्थात अपने पेशे या व्यवसाय पर उनका एकाधिकार होता था। उनके स्वामियों या धारकों द्वारा उन्हें बेचा, साझा या अंतरित किया जा सकता था।

(ii)  उपारी बलूतादार, वतनदार बलूतादारों के विपरीत, अस्थायी रूप से, विशेषकर तब जब कोई वतनदार बलूतादार गांव छोड़कर चला जाता था, ग्रामवासियों की सहायता करते थे। समाज में इनका स्थान वतनदार बलूतादारों से नीचे था। इन्हें पाहुन या मेहमान भी कहा जाता था।

ग्रामसेवकों के रूप में बलूतेदारों की तरह ही एक अन्य वर्ग भी था, जिसे अलूतेदार कहा जाता था। ग्रांड डफ के अनुसार इनकी संख्या भी बारह थी और इन्हें नारू कहा जाता था। उपारी बलूतों की भांति इनका दर्जा भी वतनदार बलूतेदारों से निम्न था तथा ये भी अस्थायी रूप से ही अपनी सेवाएं प्रदान करते थे। जैसा कि ये सभी ग्रामों में नहीं होते थे।

बलूत के अतिरिक्त, बलूतेदारों को ग्राम समुदाय द्वारा नकद या वस्तु के रूप में अतिरिक्त पारिश्रमिक भी दिया जाता था, जिसे हक  या  लवाजिमां (अनुलब्धि) कहा जाता था। इसके साथ ही, विशेष रूप से वतनदार बलूतेदारों को पारिश्रमिक के रूप में राजस्व मुक्त भूमि, जिसे इनाम कहते थे, प्रदान की जाती थी।

बलूतेदारों की स्थितिः बलूतेदारी व्यवस्था के अंतर्गत विभिन्न जातियों के कर्तव्य केवल आर्थिक गतिविधियों तक सीमित नहीं थे, अपितु इनमें पारिवारिक अनुष्ठानों, पर्वों एवं जन्म, विवाह तथा मृत्यु जैसे संस्कारों  का भी समावेश था। इन अवसरों पर विशिष्ट व्यावसायिक जातियों से उनकी विशेषज्ञता के अनुरूप सेवाएं अपेक्षित थीं। परिणामस्वरूप, विभिन्न जातियों के मध्य केवल व्यावसायिक संबंध ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने सामाजिक-धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयाम भी ग्रहण कर लिए थे। इस प्रकार, जाति और व्यवसाय एक-दूसरे के पर्याय बन गए थे। इसके अलावा, बलूतेदार ग्राम परिषदों या गोत सभा की बैठकों में भी भाग लेते थे और निर्णय प्रक्रिया में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी।

 

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