स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय इतिहास लेखन में विषयवस्तु, पद्धति और दृष्टिकोण के स्तर पर महत्वपूर्ण विविधीकरण देखा गया। इस संदर्भ में मार्क्सवादी दृष्टिकोण एक अत्यंत प्रभावशाली प्रवृत्ति के रूप में उभरा, जिसने भौतिक परिस्थितियों, वर्ग संबंधों तथा उत्पादन के तरीकों पर ध्यान केंद्रित कर ऐतिहासिक लेखन को नया आकार दिया। आर. पाल्मे दत्त की इंडिया टुडे तथा ए. आर. देसाई की सोशल बैकग्राउंड ऑफ इंडियन नेशनलिज्म जैसी अग्रणी कृतियों ने भारत में मार्क्सवादी इतिहास लेखन की नींव रखी।
एक महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन डी. डी. कोसांबी द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिन्होंने भारतीय इतिहास-अध्ययन में वैज्ञानिक पद्धतियों, अंतर्विषयक दृष्टिकोणों तथा द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पेश किया। उन्होंने धार्मिक काल-विभाजन और वंशागत वृत्तांतों को अस्वीकार करते हुए सामाजिक संरचनाओं, उत्पादन संबंधों और वर्ग संघर्ष को ऐतिहासिक लेखन का केंद्र बनाया। कोसांबी के विचारों ने इतिहासकारों जैसे कि आर. एस. शर्मा को प्रेरित किया, जिन्होंने भारतीय सामंतवाद, हाशिये पर स्थित वर्गों तथा सामाजिक परिवर्तन में अधिशेष की भूमिका का व्यवस्थित अध्ययन किया। इसी क्रम में इरफान हबीब ने मुगलकालीन कृषि व्यवस्था और मध्यकालीन अर्थव्यवस्था के सूक्ष्म विश्लेषण के माध्यम से भारत में मार्क्सवादी इतिहास लेखन को और सुदृढ़ किया।
एक अन्य महत्वपूर्ण विकास रणजीत गुहा के नेतृत्व में निम्नवर्गीय अध्ययन (Subaltern Studies) के उदय के रूप में सामने आया, जिसने अभिजात्य-केंद्रित वर्णन को चुनौती देते हुए उत्पीड़ित वर्गों के अनुभवों पर विशेष ध्यान दिया। इसका प्रतिनिधित्व उमा चक्रवर्ती जैसे विद्वानों ने किया और लैंगिक इतिहास, महिलाओं, जाति संरचनाओं तथा पितृसत्ता को ऐतिहासिक विश्लेषण के अंतर्गत लाया। इसी क्रम में रामचंद्र गुहा के योगदान से विकसित पर्यावरणीय इतिहास ने इतिहास लेखन में पारिस्थितिक सरोकारों को शामिल किया। समग्र रूप से, ये प्रवृत्तियां भारत के अतीत की अधिक समावेशी, आलोचनात्मक एवं अंतर्विषयक समझ के विकास को प्रतिबिंबित करती हैं।



