साहित्यिक चोरी (Plagiarism) का आशय किसी अन्य व्यक्ति के शब्दों, विचारों अथवा अभिव्यक्तियों को अपनी मौलिक कृति के रूप में प्रस्तुत करने से है। यद्यपि विभिन्न संस्थानों एवं संस्कृतियों के अनुसार इसकी परिभाषाओं में सूक्ष्म अंतर हो सकता है, तथापि इसे शैक्षणिक, शोधपरक एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में नैतिक मानदंडों के उल्लंघन के रूप में माना जाता है। यह अवधारणा मुख्य रूप से स्वामित्व, उत्तरदायित्व एवं प्रतिष्ठा जैसी अवधारणाओं से संबद्ध है, जिसके प्रति सभी संस्कृतियों के दृष्टिकोणों में भिन्नता देखी जाती है। यद्यपि सामान्यतः इसे लिखित कार्यों तक सीमित समझा जाता है, किंतु वस्तुतः साहित्यिक चोरी का संबंध विचारों की मौलिकता से है, चाहे उनकी अभिव्यक्ति मौखिक हो, लिखित हो अथवा किसी अन्य कलात्मक सृजन के माध्यम से की गई हो। शैक्षणिक क्षेत्र में, साहित्यिक चोरी को विशेष रूप से गंभीर माना जाता है, क्योंकि यह न केवल व्यक्तिगत साख को, अपितु संस्थानों, शोध पत्रिकाओं एवं अध्ययन के सभी क्षेत्रों की प्रतिष्ठा को भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है। फलस्वरूप, विश्वविद्यालय एवं शोध संगठन इसे हतोत्साहित तथा दंडित करने हेतु शैक्षणिक शुचिता संबंधी नीतियों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप शैक्षणिक दंड, सेवा-मुक्ति (रोजगार की हानि) अथवा अन्य अनुशासनात्मक कार्यवाहियां की जा सकती हैं। तकनीकी विकास ने जहां एक ओर साहित्यिक चोरी को सुगम बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसके संसूचन (पहचान) को भी सरल कर दिया है। वर्तमान में, लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) जैसे उपकरणों ने कृतित्व, मौलिकता तथा उत्तरदायित्व से संबद्ध नवीन विमर्श एवं वैचारिक तर्क/विवाद को जन्म दिया है।
यह आवश्यक नहीं कि बौद्धिक स्वामित्व के संदर्भ में सभी समाजों के दृष्टिकोण एकसमान हों; साथ ही, साहित्यिक चोरी स्वतः ही सदैव एक आपराधिक कृत्य की श्रेणी में नहीं आती। तथापि, यह प्रतिलिप्याधिकार उल्लंघन (Copyright Infringement), कपट अथवा नैतिक अधिकारों के हनन जैसे विधिक विषयों पर अतिव्यापी हो सकती है। भले ही यह कानून का उल्लंघन नहीं करती, फिर भी साहित्यिक चोरी एक गंभीर नैतिक अनाचार बनी रहती है, क्योंकि इसमें किसी अन्य की कृति को गलत तरीके से अपनी मौलिक कृति के रूप में निरूपित करना अंतर्निहित है।



