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इतिहास लेखन की विभिन्न विचारधाराएं विद्यमान हैं, जो अपनी विशिष्ट शैलियों, पद्धतियों और दृष्टिकोणों के माध्यम से अपनी अलग पहचान स्थापित करती हैं। यद्यपि आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन मुख्य रूप से पश्चिमी विचारों से प्रभावित रहा है, किंतु इसकी वैचारिक जड़ें राष्ट्रवादी इतिहास लेखन में खोजी जा सकती हैं। इसी राष्ट्रवादी परंपरा के परिणामस्वरूप क्षेत्रीय इतिहास लेखन को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। विगत कुछ दशकों में, नवीन ऐतिहासिक स्रोतों की उपलब्धता और तुलनात्मक रूपरेखा में क्षेत्रीय पहचान को समझने की बढ़ती आवश्यकता ने क्षेत्रीय इतिहास के महत्व को बढ़ा दिया।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र में, जहां ऐतिहासिक स्रोत बहुभाषी तथा विविध प्रकार के हैं, क्षेत्रीय इतिहास का विशेष महत्व है। यह स्थानीय स्तर पर होने वाले सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के कारणों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, क्षेत्रीय इतिहास लेखन को क्षेत्रीय उग्र-राष्ट्रवाद को बढ़ावा नहीं देना चाहिए; बल्कि इसे भारतीय इतिहास के एकीकृत और समग्र दृष्टिकोण के निर्माण में सहायक होना चाहिए।

वर्तमान में इतिहास केवल अतीत के अध्ययन तक सीमित नहीं रहा है। नवीन विचारधाराओं तथा अंतर्विषयक उपागमों के उदय के साथ इसके अध्ययन-क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। जैसा कि आर्थर मारविक ने स्पष्ट किया है, इतिहास स्वयं अतीत नहीं, बल्कि अतीत का अध्ययन है; यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है कि अतीत के किन पहलुओं का और कैसे अध्ययन किया जाना चाहिए। यद्यपि, पारंपरिक इतिहास लेखन मुख्यतः राजनीतिक और राजवंशीय आख्यानों पर केंद्रित रहा, तथापि उसने महत्वपूर्ण कालानुक्रमिक ढांचा भी उपलब्ध कराया। क्षेत्रीय इतिहास भारत के जटिल, विविधतापूर्ण और बहुलतावादी अतीत के बारे में हमारी समझ को बेहतर बनाने में योगदान देता है।

 

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