इतिहास में वस्तुनिष्ठता से आशय अतीत की घटनाओं का निष्पक्ष, तटस्थ और वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन और व्याख्या करना है। आदर्श रूप में, इतिहासकार को एक निष्पक्ष न्यायाधीश की भांति कार्य करना चाहिए, जो बिना किसी भय या पक्षपात के तथ्यों को प्रस्तुत करे। हांलाकि, ऐतिहासिक लेखन में पूर्ण वस्तुनिष्ठता प्राप्त करना कठिन है, क्योंकि ऐतिहासिक ज्ञान प्रत्यक्ष अवलोकन के बजाय स्रोतों की व्याख्या पर आधारित होता है। ऐतिहासिक अन्वेषण की प्रकृति में मूल्यांकन, चयन और अतीत का पुनर्निर्माण शामिल होती है, जिससे कुछ हद तक व्यक्तिनिष्ठता अपरिहार्य हो जाती है।
इतिहास लेखन में विभिन्न स्तरों पर पूर्वाग्रह की शुरुआत होती है, जैसे कि घटनाओं का चयन, उपलब्ध साक्ष्यों की व्याख्या तथा निष्कर्षों की प्रस्तुति। इतिहासकार की सामाजिक पृष्ठभूमि, वैचारिक अभिवृत्ति, राजनीतिक मान्यताएं, धार्मिक दृष्टिकोण और व्यक्तिगत अभिरुचियां तथ्यों की समझ और विश्लेषण को प्रभावित करती हैं। उदाहरणस्वरूप, कार्ल मार्क्स ने इतिहास को वर्ग संघर्ष के दृष्टिकोण से देखा, हेगेल ने मानवीय चेतना और आत्मा को केंद्रीय महत्व दिया, जबकि ऐक्टन ने स्वतंत्रता को ऐतिहासिक विकास का प्रमुख तत्व माना। इसी प्रकार, 1857 के विद्रोह अथवा अशोक के युद्ध का त्याग जैसी घटनाओं की व्याख्या इतिहासकार के दृष्टिकोण, पद्धति और समकालीन सरोकारों के अनुसार भिन्न-भिन्न रूप में की गई है।
ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता स्रोतों की उपलब्धता और उनकी विश्वसनीयता के कारण भी सीमित हो जाती है। अनेक अभिलेख अपूर्ण, गलत तरीके से प्रस्तुत या राजनीतिक निष्ठा से प्रभावित होते हैं, जैसा कि अकबरनामा या तारीख़-ए-फ़िरोजशाही जैसे मध्यकालीन वृत्तांतों में देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रवाद, नस्लीय पूर्वाग्रह और दलगत निष्ठा भी ऐतिहासिक आख्यानों को आकार देती हैं, जो प्रायः तथ्यों को तोड़-मरोड़ देती हैं। इन सीमाओं के बावजूद, इतिहासकारों को अधिकतम वस्तुनिष्ठता के लिए प्रयास करना चाहिए। इसके लिए विभिन्न स्रोतों के आलोचनात्मक परीक्षण, परस्पर विरोधी वृत्तांतों की तुलना और व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों के प्रति सजगता की आवश्यकता होती है। यद्यपि ऐतिहासिक ज्ञान पूर्ण निश्चितता प्रदान नहीं कर सकता, लेकिन परिशुद्ध कार्यप्रणाली और वैज्ञानिक जांच के माध्यम से, यह अतीत की विश्वसनीय और सार्थक समझ प्रदान कर सकता है। इस प्रकार, पूर्ण निष्पक्षता भले ही अप्राप्य हो, फिर भी ईमानदार और आलोचनात्मक विद्वत्ता एक इतिहासकार का सबसे आवश्यक दायित्व बना रहता है।



