इतिहास में उत्तर-आधुनिकतावाद (Post-modernism), इतिहास लेखन (Historiography) के अंतर्गत एक ऐसे आलोचनात्मक बौद्धिक विमर्श को संदर्भित करता है, जिसने बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ऐतिहासिक ज्ञान के निर्माण और उसकी व्याख्या के पारंपरिक प्रतिमानों को आधारभूत रूप से परिवर्तित कर दिया।
यह वैचारिक आंदोलन किसी एकल परिवेश में उत्पन्न नहीं हुआ, बल्कि दर्शन, सांस्कृतिक अध्ययन और सामाजिक विज्ञान के व्यापक फलक पर विकसित हो रहे उत्तर-आधुनिक चिंतन का ही एक विस्तार था। इस शब्दावली को जां-फ्रांस्वा ल्योतार्ड, (फ्रांसिसी राजनीतिक दार्शनिक) की कृति द पोस्टमॉडर्न कंडीशन : ए रिपोर्ट ऑन नॉलेज (1979) से वैश्विक ख्याति प्राप्त हुई। ल्योतार्ड ने उत्तर-आधुनिकता को 'महा-आख्यानों' (Grand Narratives) के प्रति 'अनास्था' या 'संदेह' के रूप में परिभाषित किया। इसका अर्थ उन वृहद् और सार्वभौमिक सिद्धांतों को चुनौती देना था, जो प्रगति, प्रबोधन की तर्कसंगतता (Enlightenment Rationality) या ऐतिहासिक अनिवार्यता जैसी अवधारणाओं के माध्यम से अतीत की एकरेखीय व्याख्या प्रस्तुत करते थे।
पारंपरिक रूप से, इतिहास लेखन (आधुनिकतावादी इतिहास लेखन) इस पूर्व-मान्यता पर आधारित था कि स्रोतों के सूक्ष्म विश्लेषण और वैज्ञानिक पद्धति के अनुप्रयोग द्वारा अतीत का वस्तुनिष्ठ ज्ञान प्राप्त करना संभव है। यह विचारधारा उन 'ऐतिहासिक तथ्यों' के अस्तित्व में विश्वास करती थी, जिन्हें अन्वेषण के माध्यम से एक सार्थक आख्यान या वृतांत के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता था। यद्यपि, उत्तर-आधुनिकतावादी विचारकों ने इस दृष्टिकोण को मौलिक रूप से चुनौती देते हुए यह प्रतिपादित किया कि इतिहास केवल 'अन्वेषण' का विषय नहीं, बल्कि इसे 'निर्मित' किया जाता है। उत्तर-आधुनिकतावाद के अनुसार, इतिहासकार केवल तथ्यों का संकलन नहीं करते, अपितु वे विशिष्ट भाषाई, वैचारिक और सांस्कृतिक ढांचों के भीतर उनका चयन, वर्गीकरण और निर्वचन करते हैं। इसका निहितार्थ यह है कि प्रत्येक ऐतिहासिक आख्यान अनिवार्य रूप से लेखक के व्यक्तिगत मूल्यों, उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि और उस तत्कालीन सामाजिक परिवेश की मान्यताओं को प्रतिबिंबित करता है जिसमें उसकी रचना हुई है।
उत्तर-आधुनिक इतिहास लेखन का एक आधारभूत सिद्धांत यह है कि इतिहास अतीत की वास्तविकता का 'यथारूप प्रस्तुतीकरण' नहीं, अपितु आख्यान और तर्क के माध्यम से निर्मित एक 'पाठ' है। जैक डेरिडा, मिशेल फूको और ल्योतार्ड जैसे प्रमुख उत्तर-आधुनिकतावाद के सिद्धांतकारों ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि भाषा और विमर्श ही उन मानदंडों को निर्धारित करते हैं जिन्हें हम "तथ्य" और "वास्तविकता" की संज्ञा देते हैं। अतः, कोई भी ऐतिहासिक वर्णन पूर्ण निष्पक्षता का दावा नहीं कर सकता। दृष्टांतस्वरूप, फूको ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि 'सत्ता से संबंध' ही यह सुनिश्चित करते हैं कि किसे 'प्रामाणिक ज्ञान' के रूप में स्वीकार किया जाएगा, और ऐतिहासिक ज्ञान भी इसका अपवाद नहीं है। यह दृष्टिकोण इतिहासकारों को इस वास्तविकता के प्रति सचेत करता है कि इतिहास लेखन की प्रक्रिया में सत्ता, अस्मिता (पहचान) और विचारधारा जैसी प्रवृत्तियां स्वयं अंतर्निहित होती हैं।
इतिहास लेखन के क्षेत्र में उत्तर-आधुनिकतावाद ने 'महाआख्यानों' की समालोचना को जन्म दिया है। ये वैसी वृहद् व्याख्याएं हैं जो इतिहास के बड़े कालखंडों को किसी एक सार्वभौमिक तर्क या नियम के माध्यम से परिभाषित करने का दावा करती हैं—जैसे कि इतिहास को केवल 'वर्ग-संघर्ष की गाथा' मानना या इसे 'सभ्यता की निरंतर प्रगति' के रूप में देखना। उत्तर-आधुनिकतावादियों का तर्क है कि ऐसे प्रभुत्वशाली आख्यान प्रायः स्थानीय, अल्पसंख्यक और वैकल्पिक विचारों को विस्मृत कर देते हैं। इसमें विशेष रूप से महिलाओं, मूल निवासियों और ऐतिहासिक रूप से अन्य वंचित वर्गों की आवाजों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है। एक एकल और परम सिद्धांत के स्थान पर, उत्तर-आधुनिकतावाद संदर्भगत आख्यानों की बहुलता का समर्थन करता है। यह इस धारणा को पुष्ट करता है कि इतिहास के अनेक परिप्रेक्ष्य हो सकते हैं, जो अपने विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में आकार लेते हैं।
व्यावहारिक धरातल पर, उत्तर-आधुनिकतावाद ने सूक्ष्म-इतिहास, मध्यवर्ती अध्ययन, लैंगिक इतिहास और सांस्कृतिक इतिहास जैसी नवीन प्रवृत्तियों के अभ्युदय को प्रेरित किया है। ये विधाएं उन विमर्शों, अनुभवों और वंचित या हाशिये पर रहे वर्गों को केंद्र में लाती हैं जिन्हें पारंपरिक इतिहास लेखन में प्रायः उपेक्षित रखा गया था। उत्तर-आधुनिकतावाद से प्रभावित इतिहासकार इस बात पर विशेष बल देते हैं कि विषय-वस्तु की संरचना किस प्रकार की गई है, साक्ष्यों का चयन किन आधारों पर किया गया है और ऐतिहासिक आख्यानों का निर्माण किन परिस्थितियों में किया गया है। वे केवल प्रत्यक्षवादी तथ्य-अन्वेषण तक सीमित रहने के बजाय, तथ्यों की व्याख्या और उनके निहितार्थ को अधिक महत्व देते हैं।



