आचार एवं नैतिकता का इतिहास लेखन से अटूट संबंध है, जो न्यायसंगत तथा निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाने पर बल देते हैं। यद्यपि प्रायः यह तर्क दिया जाता है कि बुनियादी तौर पर इतिहास राजनीतिक होता है—क्योंकि इतिहासकार विशिष्ट वैचारिक दृष्टिकोणों से अतीत की व्याख्या करते हैं—तथापि राजनीतिक पक्ष पर अत्यधिक निर्भरता ऐतिहासिक सत्य को खंडित करने का जोखिम उत्पन्न करती है। जब राजनीतिक उद्देश्य ऐतिहासिक विश्लेषण पर हावी हो जाते हैं, तब साक्ष्यों के चयनात्मक उपयोग अथवा उनके स्वरूप के विकृत होने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे इतिहास का मूल ध्येय—अतीत की व्याख्या एवं स्वीकृति—प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है। इतिहास लेखन के प्रति एक नैतिक दृष्टिकोण वस्तुनिष्ठता, स्रोतों पर गहन समीक्षात्मक कार्य तथा ऐतिहासिक पात्रों के प्रति सम्मान पर बल देता है। नैतिक इतिहास इतिहासकारों से यह अपेक्षा करता है कि वे उन साक्ष्यों की उपेक्षा करने से बचें जो उनके विचारों के विपरीत हों, और साथ ही वे वर्तमान पर केंद्रित व्याख्याओं का भी विरोध करें। इसके अतिरिक्त, यह दृष्टिकोण ऐतिहासिक जटिलताओं की स्वीकारोक्ति पर बल देता है, ताकि नायकों और खलनायकों के मध्य बुने गए सरलीकृत आख्यानों से आगे बढ़ा जा सके। इस संदर्भ में, समानुभूति (Empathy) और प्रतिनिधित्व अनिवार्य तत्व हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि इतिहास में सम्मिलित सभी समूहों—विशेषकर हाशिए पर धकेले गए अथवा विस्मृत कर दिए गए वर्गों के अनुभवों—को समुचित स्थान और मान्यता प्राप्त हो सके।
अनैतिक इतिहास लेखन उन कृतियों में स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है जो दासता अथवा शोषण जैसी कुप्रथाओं का औचित्य सिद्ध करती हैं या उनका महिमामंडन करती हैं। इस प्रकार की व्याख्याएं नैतिक रूप से पूर्णतः असमर्थनीय हैं और शोषित वर्गों के जीवंत अनुभवों का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करने में विफल रहती हैं। यद्यपि कतिपय व्यवस्थाओं से किन्हीं विशिष्ट समूहों को लाभ प्राप्त हुआ हो सकता है, तथापि इन परिणामों की स्वीकारोक्ति को उन व्यवस्थाओं के नैतिक औचित्य के समतुल्य नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार, शोषण के तथ्यों की उपेक्षा करना वस्तुतः पीड़ितों की पीड़ा को इतिहास के पन्नों से विस्मृत करने के समान है, जो अंततः ऐतिहासिक तर्कों को भी गंभीर रूप से क्षति पहुंचाता है।
अंततः, नैतिक इतिहास लेखन विद्वतापूर्ण संवाद एवं सर्वसम्मति के निर्माण की प्रक्रिया पर निर्भर है। निरंतर सहयोग एवं वैचारिक विमर्श के माध्यम से इतिहासकार न केवल नैतिक मानकों को स्थापित कर सकते हैं, अपितु राजनीति से प्रेरित संकीर्ण आख्यानों को पीछे छोड़कर अतीत की एक अधिक संतुलित, समानुभूतिपूर्ण (तदनुभूतिक) एवं बौद्धिक रूप से निष्कपट सहमति की ओर अग्रसर हो सकते हैं।



