ऐतिहासिक भौतिकवाद, जिसे 'वैज्ञानिक भौतिकवाद' (Scientific Materialism) की संज्ञा भी दी जाती है, मार्क्सवादी विचारधारा की एक प्रमुख अवधारणा है, जिसका प्रतिपादन कार्ल मार्क्स एवं फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा किया गया था। यह सिद्धांत उन अंतर्निहित प्रक्रियाओं की व्याख्या करता है जिनके माध्यम से समाज का क्रमिक उद्विकास और रूपांतरण होता है। मार्क्स के अनुसार, किसी भी समाज के स्वरूप और विकास का प्राथमिक निर्धारक तत्व उसकी 'उत्पादन प्रणाली' है, जिसके माध्यम से समाज अपने अस्तित्व के निर्वहन हेतु भौतिक पर्यावरण के साथ अंतःक्रिया करता है। इस प्रणाली के दो मूलभूत स्तंभ हैं: प्रथम, 'उत्पादक शक्तियां', जिनमें तकनीकी क्षमताएं और कौशल सम्मिलित हैं; तथा द्वितीय, 'उत्पादन के संबंध', जो उन शक्तियों के संचालन हेतु नियोजित आर्थिक एवं सामाजिक संरचना को परिभाषित करते हैं।
‘उत्पादक शक्तियों' के अंतर्गत उत्पादन के साधन (यथा उपकरण, यंत्र एवं कच्चा माल) तथा श्रमिकों की श्रम-शक्ति (शारीरिक क्षमता, कौशल एवं ज्ञान) सम्मिलित होती हैं। वहीं, 'उत्पादन के संबंध' उन सामाजिक संबंधों को परिभाषित करते हैं जो उत्पादक शक्तियों—अर्थात उत्पादन के साधनों एवं श्रम-शक्ति—पर नियंत्रण स्थापित करते हैं। समाज का विभिन्न आर्थिक वर्गों में विभाजन वस्तुतः उत्पादन प्रक्रिया एवं सृजित संपदा के असमान वितरण को ही प्रतिबिंबित करता है।
मार्क्स के अनुसार, 'भौतिक जीवन की उत्पादन पद्धति' ही व्यापक रूप से सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक जीवन की प्रक्रियाओं को निर्धारित करती है। वस्तुतः, समाज की आर्थिक संरचना (आधार) ही उसके वैधानिक एवं राजनीतिक संस्थानों तथा प्रचलित विचारधारा के स्वरूप को निर्धारित करती है। मार्क्स का तर्क है कि कालांतर में समाज की वर्धनशील तकनीकी क्षमताएं (उत्पादक शक्तियां) अपनी अपेक्षाकृत जड़ आर्थिक संरचना (उत्पादन के संबंध) के कारण अवरुद्ध होने लगती हैं। उत्पादक शक्तियों और उत्पादन के संबंधों के मध्य उत्पन्न यह गतिरोध अंततः सामाजिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त करता है।
दृष्टांतस्वरूप, जब यूरोपीय मध्यकाल की सामंती, भूमि-आधारित अर्थव्यवस्थाएं समाज की उत्पादक शक्तियों के विकास में अवरोधक बन गईं, तब उनका स्थान पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं ने ले लिया। ये नवीन अर्थव्यवस्थाएं बाजार प्रतिस्पर्धा, उत्पादन के साधनों के निजी स्वामित्व और वेतनभोगी श्रम के नियोजन पर आधारित थीं। इन अर्थव्यवस्थाओं को पूंजीपति वर्ग के राजनीतिक आधिपत्य तथा प्रचलित अभिस्वीकृत व्यक्तिवाद की विचारधारा ने सुदृढ़ता प्रदान की।



