books
ComputerAwareness-26.webp
previous arrow
next arrow
Shadow

प्रख्यात ब्रिटिश इतिहासकार अर्नाल्ड जोसफ टॉयनबी ने अपनी कृति अ स्टडी ऑफ हिस्ट्री  (1934-1961 के मध्य प्रकाशित) में 'चुनौती एवं प्रत्युत्तर' का सिद्धांत (Challenge and Response Theory) प्रतिपादित किया। यह सिद्धांत सभ्यताओं के उद्भव, विकास और पतन की व्याख्या करने हेतु टॉयनबी द्वारा प्रस्तुत एक तुलनात्मक एवं वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। टॉयनबी ने इतिहास को राजाओं, युद्धों या विशिष्ट राजनीतिक घटनाओं के दृष्टिकोण से देखने के बजाय 'सभ्यतागत विकास' के व्यापक अर्थ में देखा, जो दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में विश्व इतिहास को समझने हेतु अत्यंत प्रासंगिक है। टॉयनबी ने तत्कालीन प्रचलित अवधारणाओं—जैसे पर्यावरण, नस्ल, नेतृत्व या प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता—को सभ्यताओं के उत्कर्ष का एकमात्र कारण मानने से इनकार कर दिया। उनके अनुसार ये तर्क या तो त्रुटिपूर्ण थे अथवा अपूर्ण। इसके विपरीत, उन्होंने यह तर्क प्रस्तुत किया कि किसी भी समाज की सफलता या विफलता का वास्तविक निर्धारण इस बात से होता है कि वह गंभीर संकटों के प्रति किस प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। इस वैचारिक ढांचे में, 'चुनौती' एक प्रेरक के रूप में कार्य करती है और समाज द्वारा दिया गया 'प्रत्युत्तर' या प्रतिक्रिया उस सभ्यता के भविष्य और नियति का निर्धारण करता है।

टॉयनबी के अनुसार “चुनौती” का अर्थ उन अप्रत्याशित परिस्थितियों अथवा घटनाओं से है, जो जनमानस के पारंपरिक जीवन-निर्वाह के प्रतिमानों के सम्मुख संकट उत्पन्न करती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये चुनौतियां बहुआयामी हो सकती हैं, जिनमें भौतिक (विषम भौगोलिक, प्रतिकूल जलवायु या संसाधनों का अभाव), सामाजिक (आंतरिक संघर्ष, स्तरीकरण या नैतिक पतन) तथा बाह्य (विदेशी आक्रमण अथवा सीमावर्ती सभ्यताओं का दबाव) कारक सम्मिलित हैं। यद्यपि ये चुनौतियां अस्तित्वगत संकट उत्पन्न करती हैं, तथापि इन्हीं में सुधार और प्रगति की संभावनाएं भी अंतर्निहित होती हैं। टॉयनबी के अनुसार अत्यधिक कठिनाइयां सभ्यताओं का विनाश कर देती हैं, जबकि संघर्ष का पूर्ण अभाव समाज को जड़ता की ओर ले जाता है। विकास की प्रक्रिया केवल तभी संभव है जब चुनौती 'स्वर्णिम मध्यमान' के अनुरूप हो—अर्थात वह न तो इतनी नगण्य हो कि समाज अनुत्तरदायी बना रहे, और न ही इतनी आक्रामक कि समाज उसका प्रतिकार न कर सके। "प्रत्युत्तर" का तात्पर्य उन नवीन परिस्थितियों के प्रति समाज की प्रतिक्रिया से है। एक सफल प्रत्युत्तर के लिए सृजनात्मक कल्पनाशीलता, कुशल नेतृत्व और सामूहिक पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। उल्लेखनीय है कि ये चुनौतियां स्वतःस्फूर्त होती हैं, और इनके प्रति दिए गए प्रत्युत्तर का परिणाम सदैव अनिश्चित होता है, जो अंततः सभ्यता के उत्थान या पतन का मार्ग प्रशस्त करता है।

टॉयनबी ने इस वैचारिक ढांचे को मुख्य रूप से उन वृहद् सभ्यताओं पर लागू किया, जहां उत्पन्न चुनौतियां संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के अस्तित्व के लिए संकट बन गई थीं। इन चुनौतियों के प्रति दिए जाने वाले प्रत्युत्तरों का स्वरूप अत्यंत व्यापक था। जो पूर्ण निष्क्रियता से लेकर तकनीकी नवाचार, सामाजिक पुनर्गठन और आर्थिक ढांचे में क्रांतिकारी परिवर्तनों तक विस्तृत था। कालांतर में, इन्हीं प्रतिक्रियाओं की प्रकृति ने यह सुनिश्चित किया कि कोई सभ्यता अपने अस्तित्व की रक्षा करते हुए विकास की ओर अग्रसर होगी अथवा पतन की ओर।

टॉयनबी ने अपने सिद्धांत की पुष्टि अनेक ऐतिहासिक दृष्टांतों के माध्यम से की है। उन्होंने तर्क दिया कि मिस्र की सभ्यता का उद्भव नील नदी की अनियमित बाढ़ द्वारा प्रस्तुत 'चुनौती' के प्रत्युत्तर के रूप में हुआ, जिसने वहां के निवासियों को एक सुसंगठित सिंचाई प्रणाली और कुशल प्रशासनिक ढांचे के निर्माण हेतु विवश किया। उनके विश्लेषण के अनुसार, यूनानी सभ्यता का विकास सीमित संसाधनों वाले जटिल पर्वतीय भू-भाग की चुनौती की प्रतिक्रिया में हुआ। इस भौगोलिक विवशता ने उन्हें समुद्री व्यापार की ओर उन्मुख किया और नवीन राजनीतिक प्रयोगों (जैसे नगर-राज्यों) को प्रोत्साहन दिया। इसी क्रम में, पश्चिमी सभ्यता के अभ्युदय की व्याख्या रोमन साम्राज्य की व्यवस्था के विखंडन तथा बर्बर आक्रमणों और गंभीर धार्मिक परिवर्तनों द्वारा उत्पन्न चुनौतियों के विरुद्ध एक सफल प्रत्युत्तर के रूप में की गई।

 

spectrum-books-logo

  

Spectrum Books Pvt. Ltd.
Janak Puri,
New Delhi-110058

  

Ph. : 91-11-25623501
Mob : 9958327924
Email : info@spectrumbooks.in