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उपयोगितावाद (Utilitarianism) एक नैतिक सिद्धांत है जो इस मौलिक प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास करता है कि, 'मनुष्य को क्या करना चाहिए?' यह विचारधारा इस विचार पर आधारित है कि सर्वोत्तम कार्य वही है जिससे अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख सुनिश्चित हो और दुःख या पीड़ा न्यूनतम हो सके। इसके अनुसार किसी भी निर्णय का मूल्यांकन भविष्य में होने वाले उसके परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। नैतिक निर्णय लेते समय हमें उससे प्राप्त होने वाले लाभों (सकारात्मक प्रभावों) और हानियों (नकारात्मक प्रभावों) का तुलनात्मक विश्लेषण करना चाहिए। यदि किसी कार्य के सकारात्मक परिणाम उसके नकारात्मक प्रभावों से अधिक हैं, तो वह कार्य नैतिक रूप से उचित माना जाता है। उपयोगितावाद के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति के सुख को समान महत्व दिया जाना चाहिए। यह सिद्धांत केवल व्यक्तिगत सुख तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात पर भी बल देता है कि मानव कर्म ऐसे हों जो समाज के अन्य सदस्यों के सुख में भी वृद्धि करें। इसका मूल उद्देश्य अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख की प्राप्ति करना है।

मूलतः जेरेमी बेंथम, और तत्पश्चात जॉन स्टुअर्ट मिल द्वारा विकसित इस सिद्धांत ने औपनिवेशिक भारत में अंग्रेजों द्वारा लागू की गई कई नीतियों और सुधारों, विशेषकर 19वीं शताब्दी के आरंभ में सती प्रथा उन्मूलन (1829) तथा भारत में पाश्चात्य शिक्षा के आरंभ के रूप में किए गए सामाजिक सुधार, को रूप दिया।

आलोचना: यद्यपि उपयोगितावाद का सिद्धांत अधिकतम लोगों के सुख या भलाई का समर्थन करता है, तथापि यह आलोचना से मुक्त नहीं है, जैसा कि इसके आलोचकों का तर्क है कि इस सिद्धांत में कुछ अंतर्निहित समस्याएं हैं। पहली समस्या परिणामों की अनिश्चितता से संबंधित है, क्योंकि किसी भी मानवीय कृत्य के समस्त दीर्घकालिक परिणामों का सटीक पूर्वानुमान लगाना अत्यंत जटिल कार्य है। दूसरी समस्या यह है कि 'अधिकतम व्यक्तियों के सुख' की खोज में प्रायः सामाजिक न्याय और निष्पक्षता की अनदेखी कर दी जाती है। उदाहरणार्थ, यदि किसी नगर में कूड़ा-कचरा निस्तारण स्थल के चयन का प्रश्न हो, तो बहुसंख्यक जनसंख्या के हित में उसे किसी गरीब बस्ती में स्थापित करना उपयोगितावादी दृष्टि से उचित प्रतीत हो सकता है, किंतु उस क्षेत्र के निवासियों के साथ यह स्पष्टतः अन्यायपूर्ण होगा।

 

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