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भारत ने 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को स्वतंत्रता हासिल की, जिसके बाद जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। यद्यपि, यह स्वतंत्रता देश के विभाजन (भारत-पाकिस्तान) के साथ प्राप्त हुई, जिसके परिणामस्वरूप संपूर्ण देश को अभूतपूर्व हिंसा और विस्थापन की त्रासदी का सामना करना पड़ा। इन कठिन परिस्थितियों के साथ-साथ नवगठित राष्ट्र के समक्ष विभिन्न प्रकार की चुनौतियां भी खड़ी थी।

भारत की प्रथम सरकार एवं नेताओं के सामने सबसे प्रमुख और तात्कालिक चुनौती देश में स्थित अलग-अलग क्षेत्रीय रियासतों और प्रशासनिक समन्वय को लेकर थी, जैसा कि एक प्रमुख रियासत जूनागढ़ का शासक पाकिस्तान में सम्मिलित होने का इच्छुक था, तो हैदाबाद तथा जम्मू-कश्मीर के शासक अपनी संप्रभुता नहीं खोना चाहते थे। इन रियासतों के साथ ही देश में अनेक छोटी-छोटी रियासतें थीं। इन सभी रियासतों को भारत में एकीकृत करना एक बड़ी समस्या थी।

दूसरी चुनौती एक सुदृढ़ लोकतंत्र की स्थापना करना थी। यद्यपि संविधान ने मौलिक अधिकारों और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के माध्यम से संसदीय लोकतंत्र का ढांचा तैयार किया, जिससे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के लिए एक वैधानिक आधार सुनिश्चित हुआ, किंतु वास्तविक चुनौती केवल संविधान निर्माण तक सीमित नहीं थी अपितु, लोकतांत्रिक सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप प्रदान करना और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप लोकतांत्रिक व्यवहारों एवं स्वस्थ परंपराओं को विकसित करना अनिवार्य था, जिसके बिना वैधानिक प्रावधान औचित्यहीन थे।

भारत के समक्ष तीसरी चुनौती यह सुनिश्चित करना था कि विकास और कल्याण केवल विशिष्ट वर्गों तक सीमित न रहकर समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचे। जैसा कि विभाजन के दौरान लाखों लोग विस्थापित हुए थे तथा अल्पसंख्यक समुदायों में भय व्याप्त था, जिनके लिए समुचित उपाय करना अत्यावश्यक था। इस उद्देश्य हेतु, हालांकि संविधान में समानता के सिद्धांत, सामाजिक रूप से वंचित समूहों के लिए विशेष संरक्षण, तथा धार्मिक एवं सांस्कृतिक समुदायों के अधिकारों को स्पष्ट रूप से स्थापित किया गया। इसके अतिरिक्त, राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में उन महत्वपूर्ण कल्याणकारी लक्ष्यों को रेखांकित किया गया जिन्हें लोकतांत्रिक राजनीति के माध्यम से प्राप्त किया जाना था। लेकिन वास्तविक चुनौती इन संवैधानिक दिशानिर्देशों के अनुरूप आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन के लिए प्रभावी नीतियों को सफलतापूर्वक कार्यान्वित करने की थी।

इसके अलावा, स्वतंत्रता अधिनियम में भारतीय सिविल सेवाओं तथा अन्य संगठनों के कर्मचारियों और सैन्य संपदाओं के विभाजन के साथ-साथ दोनों देशों के सीमाओं के लिए किए गए विभाजन ने देश के समक्ष गंभीर और दीर्घकालीन प्रशासनिक और आर्थिक संकट उत्पन्न कर दिए, फलस्वरूप भारत को पंजाब की महत्वपूर्ण नहर प्रणालियों और उपजाऊ कृषि क्षेत्रों से वंचित होना पड़ा, जिसने कृषि उत्पादन, व्यापार और प्रारंभिक विकास की योजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डाला। इस प्रकार, विभाजन ने न केवल प्रशासनिक अक्षमता को जन्म दिया, बल्कि भारत के लिए दीर्घकालिक आर्थिक चुनौतियों में और अधिक वृद्धि कर दी।

यद्यपि पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत की प्रथम सरकार द्वारा योजनाबद्ध एवं क्रमिक रूप से इन चुनौतियों को हल करने का प्रयास किया गया, जिनमें से कई समस्याओं के स्थायी समाधान सफलतापूर्वक कर भी दिए गए, तथापि कुछ समस्याएं आज भी हमारे देश में बनी हुई हैं।

 

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