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सुधर्मवाद (Evangelicalism) का प्रादुर्भाव अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभिक काल में ब्रिटेन में एक सुधारवादी ईसाई आंदोलन के रूप में हुआ, जिसने व्यक्तिगत मोक्ष, नैतिक अनुशासन और वैश्विक स्तर पर ईसाई धर्म के प्रसार को अपना प्राथमिक कर्तव्य घोषित किया। जब ईसाई धर्म प्रचार से संबंधित उत्साहपूर्ण विचारों का औपनिवेशिक भारत में आगमन हुआ, तब उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की धार्मिक तटस्थता की दीर्घकालिक नीति, जिसका मुख्य उद्देश्य व्यापारिक लाभ और राजनीतिक स्थिरता को अक्षुण्ण रखने हेतु भारतीयों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं में किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से बचना था, को चुनौती दी।

ब्रिटेन के सुधर्मवादी विचारकों का तर्क था कि ब्रिटिश शासन पर भारत को सभ्य बनाने और ईसाई धर्म के प्रसार का नैतिक उत्तरदायित्व है। उनका मानना था कि ईसाई धर्म, प्रगति, सामाजिक सुधार और भौतिक समृद्धि से अविछिन्न रूप से संबद्ध है। इस विचारधारा को चार्ल्स ग्रांट के रूप में एक सशक्त पैरोकार मिला, जो कंपनी का एक उच्चाधिकारी था और अपने धर्म परिवर्तन के उपरांत उसने भारतीय समाज को 'भ्रष्ट' एवं 'नैतिक रूप से पतित' बताते हुए इसकी कटु आलोचना की। ग्रांट ने अपने लेखन के माध्यम से हिंदू धर्म को भारत की सामाजिक समस्याओं या बुराइयों का मूल कारण निरूपित किया तथा इनके निवारण हेतु मिशनरी गतिविधियों, आंग्ल शिक्षा और ईसाई धर्म के नैतिक मूल्यों को अपनाने का प्रस्ताव दिया। इसके अतिरिक्त, उसने धार्मिक विश्वास को वाणिज्यिक हितों से जोड़ते हुए यह तर्क भी प्रस्तुत किया कि ईसाई धर्म के प्रभाव में आने के पश्चात भारतीय न केवल अधिक कुशल श्रमिक बनेंगे, अपितु ब्रिटिश उत्पादों के बड़े उपभोक्ता बन जाएंगे।

सुधर्मवाद सभ्य बनाने के मिशन (Civilizing Mission) की उन उदारवादी मान्यताओं के साथ घनिष्ठता से संरेखित था, जिनका यह तर्क था कि पश्चिमी समाज सांस्कृतिक रूप से अधिक उन्नत हैं और अन्य समाजों का उत्थान करना उनका नैतिक दायित्व है। इस वैचारिक उद्देश्य की पूर्ति में शिक्षा एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गई, जिसकी परिणति 'मैकाले के स्मरण-पत्र (1835) के रूप में हुई, जिसने अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से भारतीयों के चिंतन और मूल्यों को परिवर्तित करने में सहायता की। इन वैचारिक परिवर्तनों ने कालांतर में महत्वपूर्ण नीतिगत बदलावों का मार्ग प्रशस्त किया, जिनमें मिशनरियों को भारत में प्रवेश की अनुमति देने वाले 1813 के चार्टर अधिनियम सहित, सती प्रथा के उन्मूलन जैसे सामाजिक सुधार और बढ़ते हुए सांस्कृतिक हस्तक्षेप के प्रयास शामिल थे।

इन परिवर्तनों के प्रति भारतीय प्रतिक्रियाओं में व्यापक भिन्नता थी। जहां समाज के एक वर्ग ने सुधारों और आंग्ल शिक्षा को सहर्ष स्वीकार किया, वहीं दूसरे वर्ग ने सांस्कृतिक पुनरुत्थान और धार्मिक सुधार आंदोलनों के माध्यम से इसका प्रतिरोध किया। हालांकि, संयोग से सुधर्मवादी हस्तक्षेपों ने भारतीयों में आत्म-चेतना को सुदृढ़ किया, और आधुनिक भारत में राजनीतिक जागृति तथा राष्ट्रवाद के उदय में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 

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