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भारत में स्थानीय स्वशासन की जड़ें अत्यंत प्राचीन हैं, किंतु इसका आधुनिक संस्थागत स्वरूप ब्रिटिश शासन के दौरान विकसित हुआ। यद्यपि गुप्त और चोल जैसे प्राचीन भारतीय राजवंशों ने ग्राम स्वायत्तता की प्रभावी प्रणालियां विकसित की थी, तथापि वे अंग्रेजों द्वारा स्थापित प्रतिनिधि एवं निर्वाचित स्थानीय निकायों के समान नहीं थीं। आधुनिक स्थानीय शासन व्यवस्था औपनिवेशिक राज्य और जनसाधारण के बीच बढ़ती प्रशासनिक दूरी की प्रतिक्रिया के रूप में उभरी, जिसका उद्देश्य स्थानीय आवश्यकताओं और शिकायतों का प्रभावी ढंग से समाधान करना था।

भारत में स्थानीय स्वशासन के प्रारंभिक ब्रिटिश प्रयोग 1773 के रेगुलेटिंग ऐक्ट के माध्यम से मद्रास, कलकत्ता और बॉम्बे जैसे प्रेजिडेंसी नगरों में शुरू किए गए, जिसके अंतर्गत 'जस्टिस ऑफ पीस' को नागरिक उत्तरदायित्व प्रत्यायोजित किए गए। उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान नगरपालिकाओं से संबंधित विभिन्न अधिनियमों द्वारा कराधान के दायरे और नागरिक प्रकार्यों का विस्तार तो किया गया, किंतु जनभागीदारी सीमित रही। 1850 के पश्चात प्रेजिडेंसी नगरों के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी नगरपालिकाओं का उदय हुआ, जिन पर मुख्य रूप से मनोनीत अधिकारियों का वर्चस्व था।

1870 में प्रस्तुत लॉर्ड मेयो का प्रस्ताव भारतीय प्रशासन में एक निर्णायक मोड़ था, जिसने वित्तीय विकेंद्रीकरण एवं अधिक स्थानीय भागीदारी पर बल दिया। इस पहल को 1882 के लॉर्ड रिपन के ऐतिहासिक प्रस्ताव द्वारा और अधिक सुदृढ़ता मिली, जिसने निर्वाचित बहुमत, वित्तीय स्वायत्तता, तथा राज्य के अप्रत्यक्ष नियंत्रण का समर्थन करते हुए स्थानीय स्वशासन की नींव रखी। इन्हीं सुधारवादी प्रयासों के कारण लॉर्ड रिपन को 'भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक' के रूप में अभिहित किया जाता है। ऑन डिसेंट्रलाइजेशन रॉयल कमीशन (1909) तथा भारत सरकार अधिनियम, 1935 सहित बाद के अनेक सुधारों ने स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व और स्वायत्तता के दायरे का विस्तार किया। स्वतंत्रता के समय तक, स्थानीय स्वशासन लोकतांत्रिक सहभागिता हेतु एक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका था, जिसने स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 के तहत पंचायती राज संस्थाओं को प्रभावित किया।

 

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