भारत में भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन संघीय शासन को सुदृढ़ करने और केंद्र–राज्य संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की दिशा में एक निर्णायक चरण सिद्ध हुआ। इस दिशा में सर्वाधिक व्यापक सुधार राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के माध्यम से किया गया, जिसके तहत राज्यों की सीमाओं का निर्धारण मुख्यतः भाषाई आधार पर किया गया। संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 के साथ लागू इस निर्णय ने स्वतंत्रता के पश्चात भारत के राजनीतिक मानचित्र और प्रशासनिक ढांचे को एक नया स्वरूप प्रदान किया।
स्वतंत्रता के समय, भारत को विरासत में ब्रिटिश प्रांतों और भारतीय रियासतों (Princely States) से युक्त जटिल क्षेत्रीय व्यवस्था मिला था। 1950 के संविधान के अंतर्गत इन क्षेत्रों को भाग क, ख, ग और घ राज्यों में वर्गीकृत किया गया, जो तत्कालीन प्रशासनिक विविधताओं दर्शाता था। किंतु, यह व्यवस्था भारत की भाषाई विविधता और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के प्रबंधन में अपर्याप्त सिद्ध हुई। परिणामस्वरूप, पृथक भाषाई राज्यों हेतु जन-आंदोलनों—विशेषकर 1953 में आंध्र प्रदेश के गठन ने राज्यों के पुनर्गठन की आवश्यकता को रेखांकित कर दिया।
इन मांगों के समाधान हेतु, 1953 में न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में 'राज्य पुनर्गठन आयोग' का गठन किया गया। इस आयोग की अनुशंसाओं के फलस्वरूप राज्यों के भाग क से घ तक के वर्गीकरण की पूर्ववर्ती व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया तथा सुस्पष्ट प्रशासनिक आधार पर राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों का गठन किया गया। इस व्यवस्था के अंतर्गत, जहां संघ राज्य क्षेत्रों का प्रशासन केंद्र के अधीन रहा, वहीं भाषाई आधार पर पुनर्गठित राज्यों को संवैधानिक ढांचे के भीतर स्वायत्तता प्रदान की गई।
1956 के पुनर्गठन ने संघ को कमजोर किए बिना भाषाई पहचानों को समायोजित कर एकता और विविधता के बीच संतुलन स्थापित किया। इससे क्षेत्रीय असंतोष में कमी आई, प्रशासनिक दक्षता में सुधार हुआ और सहकारी संघवाद को सुदृढ़ कर संघ–राज्य संबंधों को मजबूत किया गया। यद्यपि बाद में राज्यों की सीमाओं में कतिपय बदलाव किए गए, तथापि 1956 का अधिनियम आधारभूत बना रहा। इसने यह सिद्ध किया कि सशक्त संघीय ढांचे के भीतर भाषाई समायोजन राष्ट्रीय एकीकरण को कमजोर करने के बजाय उसे और सुदृढ़ कर सकता है।



