‘पुनरुत्थानवाद’ (Revivalism) की अवधारणा एक धार्मिक आंदोलन से संबद्ध है जिसका उद्देश्य धर्म के प्रति लोगों के उत्साह को पुनः जागृत तथा आस्था को पुनर्जीवित करना था। मूलतः चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में यूरोप तथा उन्नीसवीं शताब्दी में अमेरिका में शुरू हुए पुनरुत्थानवाद का उदय औपनिवेशिक शासन (उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी) के दौरान भारत में उन बौद्धिक, सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतिक्रियाओं के रूप में हुआ, जिनका प्राथमिक उद्देश्य स्वदेशी परंपराएं, जो औपनिवेशिक वर्चस्व, पश्चिमी शिक्षा और मिशनरी गतिविधियों के कारण ह्रास की स्थिति में पहुंच गई थीं, का पुनरुद्धार एवं पुनर्स्थापन करना था। यद्यपि पुनरुत्थानवाद का विकास समाज सुधार आंदोलनों के समानांतर हुआ, किंतु अपने वैचारिक आधार और दार्शनिक प्रवृत्ति के कारण यह सुधारवादी आंदोलनों से मौलिक रूप से भिन्न था। जहां सुधारवादी धाराओं ने आधुनिकता और परंपरा की तर्कसंगत आलोचना को प्राथमिकता दी, वहीं पुनरुत्थानवादी आंदोलनों ने भारतीय समाज के नैतिक एवं सांस्कृतिक नवजागरण के लिए अपने गौरवशाली अतीत, विशेषकर प्राचीन शास्त्रों और आध्यात्मिक विरासत को आधार बनाया। वस्तुतः इस परिघटना को पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभाव की प्रतिक्रिया और प्रारंभिक राष्ट्रवादी चेतना के एक अनिवार्य घटक के रूप में देखा जाता है, जहां स्वदेशी परंपराओं के प्रति गर्व की भावना ने औपनिवेशिक सांस्कृतिक आधिपत्य के विरुद्ध प्रतिरोध की नींव रखी।
भारत के प्रमुख पुनरुत्थानवादी आंदोलन
- रामकृष्ण आंदोलन तथा रामकृष्ण मिशनः पुनरुत्थानवादी चेतना की यह सशक्त धारा रामकृष्ण मिशन के रूप में परिलक्षित हुई, जिसे स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं को आधार बनाकर 1897 में संस्थागत रूप प्रदान किया। यद्यपि इसने आधुनिक मानवतावादी मूल्यों को आत्मसात किया, तथापि इसका मुख्य बल वेदांतिक आध्यात्मिकता, सार्वभौमिकता और 'नर सेवा ही नारायण सेवा' के सिद्धांत पर था। स्वदेशी आध्यात्मिक विरासत पर आधारित यह दृष्टिकोण वस्तुतः उस औपनिवेशिक विमर्श का खंडन था, जो भारतीय संस्कृति को पिछड़ा और हीन सिद्ध करने का प्रयास करता था।
- आर्य समाजः यह दयानंद सरस्वती द्वारा शुरू किया गया एक हिंदू सुधारवादी आंदोलन था, जिसने ‘‘वेदों की ओर लौटो’’ मूलमंत्र के साथ प्राचीन वैदिक ज्ञान के पुनरुत्थान को आधुनिक शिक्षा तथा नैतिक उत्थान के साथ समन्वित किया और एक सशक्त सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में, विशेषकर उत्तर भारत में, स्थापित हुआ।
- थियोसोफिकल आंदोलनः यद्यपि यह आंदोलन दो पाश्चात्य बुद्धिजीवियों—मैडम एच.पी. ब्लावैट्स्की और कर्नल एम. एस. अल्काट द्वारा शुरू किया गया था, तथापि इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म की प्राचीन विरासत तथा पहचान को पुनर्स्थापित करने का प्रयास करना था।
- देवबंद आंदोलनः देवबंद आंदोलन, जिसका केंद्र 1866 में स्थापित दारुल उलूम देवबंद था, ने कुरान और हदीस के गहन अनुशीलन के माध्यम से इस्लामी विद्वता और धार्मिक आचरण को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। इस विचारधारा ने न केवल मध्यकालीन कुरीतियों के अंधानुकरण का विरोध किया, बल्कि पश्चिमी चिंतन पद्धतियों के अनैतिक समावेश को भी अस्वीकार कर दिया और सांस्कृतिक लचीलेपन के साधन के रूप में मौलिक परंपराओं की प्रासंगिकता को पुनः स्थापित किया।
- वहाबी वलीउल्लाह आंदोलनः अरेबिया के अब्दुल वहाब (1703-92) तथा शाह वलीउल्लाह (1702-62) की शिक्षाओं के प्रकाश एवं प्रेरणाओं के दृष्टिगत पाश्चात्य प्रभावों के विरुद्ध मुसलमानों की सर्वप्रथम जो प्रतिक्रिया हुई, उसे ही वहाबी आंदोलन या वलीउल्लाह आंदोलन के नाम से जाना जाता है। वास्तव में यह एक पुनर्जागरणवादी आंदोलन था। शाह वलीउल्लाह अठारहवीं सदी में मुसलमानों के प्रथम नेता थे, जिन्होंने धर्म (इस्लाम) के प्रति भारतीय मुसलमानों में आई गिरावट के बारे में चिंता प्रकट की। उन्होंने भारतीय मुसलमानों के रीति-रिवाजों तथा मान्यताओं में व्याप्त कुरीतियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया।



