‘प्राच्यवाद’ (Orientalism) मूलतः अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी या औपनिवेशिक काल में विद्वानों द्वारा शुरू की गई उस शिक्षण व्यवस्था को संदर्भित करता है, जिसमें पूर्वी संस्कृतियों (मुख्यतः एशियाई) के प्राचीन समाजों की भाषाओं, साहित्य, धर्म, दर्शन, इतिहास, विधियों तथा कलाओं का अध्ययन शामिल है। परंतु एडवर्ड सईद के अनुसार, ‘‘प्राच्यवाद के अंतर्गत पूर्वी समाजों को तर्कसंगत और प्रगतिशील पश्चिम के विपरीत पिछड़ा या गतिहीन/अप्रगतिशील के रूप में देखना शामिल था।“ इस ढांचे ने औपनिवेशिक प्रभुत्व को उचित ठहराया एवं नीतियों, जिनमें शिक्षा तथा शासन भी शामिल थे, को नया आयाम दिया। सईद का यह तर्क अत्यंत महत्वपूर्ण है कि प्राच्यवादी अध्ययन कोई तटस्थ शैक्षणिक गतिविधि नहीं थी, अपितु यह औपनिवेशिक हितों और सत्ता के समीकरणों द्वारा निर्मित प्रतिनिधित्व की एक सुनियोजित प्रणाली थी। इस विचारधारा ने पूर्वी समाजों को अक्षम और जड़ दिखाकर उन पर पश्चिमी नियंत्रण तथा प्रभुत्व को नैतिक रूप से उचित ठहराने का कार्य किया। वस्तुतः, पूर्व के बारे में यह विचारधारा बौद्धिक नियंत्रण के एक साधन के रूप में उभरी, जिसने औपनिवेशिक शक्तियों के राजनीतिक और आर्थिक वर्चस्व को सुदृढ़ किया।
भारत के संदर्भ में, प्राच्यवाद की एक विशिष्ट विशेषता प्राचीन संस्कृत शास्त्रों और शास्त्रीय ग्रंथों पर अत्यधिक निर्भरता थी, जैसा कि प्राच्यवादी विद्वानों का यह मंतव्य था कि भारतीय समाज की वास्तविक प्रकृति को केवल उसके प्राचीन साहित्य के माध्यम से ही समझा जा सकता है। अतः औपनिवेशिक शासन को सुदृढ़ करने हेतु ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए भारतीय समाज की संरचना, धार्मिक मान्यताओं और विधिक परंपराओं का गहन ज्ञान प्राप्त करना एक प्रशासनिक अनिवार्यता बन गई। इसी आवश्यकता ने प्राच्यवादी विद्वत्ता और औपनिवेशिक प्रशासन के मध्य एक घनिष्ठ अंतर्संबंध को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा प्रभावी नीति निर्माण तथा न्याय व्यवस्था के सुचारु संचालन के उद्देश्य से भारतीय कानूनों, रीति-रिवाजों और सामाजिक नियमों का अध्ययन किया गया और इसके लिए उन्होंने वेदों, उपनिषदों और मनुस्मृति जैसे ग्रंथों को भारतीय सामाजिक संगठन और विधि का एकमात्र प्रामाणिक स्रोत स्वीकार कर लिया। किंतु इस दृष्टिकोण ने भारत की क्षेत्रीय विविधताओं, मौखिक परंपराओं और निरंतर होने वाले ऐतिहासिक परिवर्तनों की पूर्णतः उपेक्षा कर दी। इस प्रकार, भारत के विषय में यह विचारधारा केवल एक विशुद्ध शैक्षणिक शोध मात्र न रहकर औपनिवेशिक नियंत्रण और शासन को वैधता प्रदान करने वाला सामरिक साधन बन गई।
फलस्वरूप, 'स्वदेशी कानूनों' के आधार पर शासन करने के नाम पर अंग्रेजों ने प्राचीन ग्रंथों के चुनिंदा अध्ययन द्वारा हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) संहिताबद्ध किए। यद्यपि इन व्याख्याओं में वास्तविक सामाजिक व्यवहारों और लोकप्रथाओं की समझ का अभाव था, तथापि इस प्रक्रिया ने भारत के लचीले रीति-रिवाजों को कठोर कानूनी श्रेणियों में परिवर्तित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि जातिगत भेदभाव और पितृसत्तात्मक संरचनाएं कमजोर होने के बजाय और अधिक सुदृढ़ हो गईं, जिससे सामाजिक पदानुक्रम को और अधिक वैधानिक मजबूती मिली।



