प्राच्य निरंकुशतावाद/अधिनायकवाद (Oriental Despotism) का सिद्धांत एक औपनिवेशिक अवधारणा थी, जिसका प्रयोग भारत में औपनिवेशिक हितों को न्यायसंगत ठहराने के लिए किया गया। इस सिद्धांत ने भारतीय समाज को एक बर्बर समाज के रूप में चित्रित किया, जहां निरंकुश शासकों का स्वेच्छाचारी शासन व्याप्त था। इस सिद्धांत के समर्थकों का तर्क था कि भारतीय शासक लोकमत की पूर्ण उपेक्षा करते हुए भूमि, सिंचाई, अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र पर एकाधिकार रखते थे। वस्तुतः यह दृष्टिकोण पूर्वाग्रहों और पक्षपातपूर्ण मान्यताओं से प्रेरित था, जिसे कालांतर में आधुनिक शोधों ने पूर्णतः तर्कहीन और निराधार सिद्ध कर दिया। प्राच्य अधिनायकवाद की यह अवधारणा 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में किए गए 'प्राच्य अध्ययनों' (Oriental Studies), जो संस्कृत के सीमित ग्रंथों के त्रुटिपूर्ण विश्लेषण पर आधारित थे, से उत्पन्न हुई थी। जेम्स मिल जैसे इतिहासकारों ने भारतीय राजाओं को भूमि के स्वेच्छाचारी स्वामी के रूप में प्रस्तुत किया और भारत में वैयक्तिक संपत्ति की मौजूदगी को सिरे से खारिज कर दिया। इसके अतिरिक्त, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक श्रेष्ठता की ब्रिटिश भावना ने भारत को एक पराभौतिक और पिछड़े समाज के रूप में देखने की धारणा को और अधिक सुदृढ़ किया। मार्क्स और मिल जैसे विचारकों ने भारत को एक शुष्क देश तथा सिंचाई व्यवस्था पर नौकरशाही के पूर्ण नियंत्रण को अनिवार्य मानते हुए भारतीय इतिहास को कतिपय रूढ़िबद्ध धारणाओं तक सीमित या महत्वहीन कर दिया। बिना जांची-परखी इन धारणाओं को तत्कालीन औपनिवेशिक प्रशासकों एवं इतिहासकारों द्वारा व्यापक रूप से स्वीकार किया गया, जिससे भारतीय इतिहास की व्याख्या के लिए प्राच्य अधिनायकवाद एक प्रभावशाली किंतु त्रुटिपूर्ण आधार बन गया। हालांकि, कालांतर में भारतीय राजव्यवस्था के गहन और वस्तुनिष्ठ अध्ययनों ने इस सिद्धांत को एक मिथक सिद्ध कर इसे कड़ी चुनौती दी। यहां तक कि वॉरेन हेस्टिंग्स जैसे ब्रिटिश अधिकारियों ने भी भारतीय शासकों को केवल निरंकुश मानने के विचार को अस्वीकार कर दिया। अर्थशास्त्र और आइन-ए-अकबरी जैसे ऐतिहासिक साक्ष्यों ने भारत में सुगठित शासन प्रणाली और शासन कौशल के आदर्शों के अस्तित्व को प्रमाणित किया, जो औपनिवेशिक काल की विधिहीनता और अधिनायकवाद के दावों का तार्किक खंडन करते हैं। यह धारणा कि सिंचाई प्रबंधन हेतु एक केंद्रीकृत नौकरशाही अपरिहार्य थी, ऐतिहासिक शोधों के उपरांत निराधार सिद्ध हुई है, क्योंकि तत्कालीन साक्ष्य स्पष्ट करते हैं कि सिंचाई व्यवस्था का संचालन प्रायः स्थानीय अथवा प्रांतीय स्तर पर स्वायत्त रूप से किया जाता था। इसी प्रकार, भूमि स्वामित्व भी केवल राजा के अधीन नहीं था; समाज में निजी एवं सामुदायिक स्वामित्व की उपस्थिति ने न केवल शासक की निरंकुश शक्ति को नियंत्रित किया, अपितु प्राच्य अधिनायकवाद से संबंधित औपनिवेशिक तर्कों को भी मौलिक रूप से कमजोर कर दिया।

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