निस्यंदन या अधोमुखी निस्यंदन का सिद्धांत (Filtration Theory) भारत में अंग्रेजों की औपनिवेशिक शिक्षा को संदर्भित करता है, जिसके तहत ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज के उच्च एवं मध्यम वर्ग को शिक्षित करने की नीति अपनाई, जिसका उद्देश्य एक ऐसे वर्ग का सृजन करना था जो 'रक्त एवं वर्ण में भारतीय हो, किंतु अभिरुचि, विचारों, नैतिकता एवं बुद्धि में अंग्रेज हो'। इस वर्ग की परिकल्पना औपनिवेशिक शासन एवं जनसामान्य के मध्य 'दुभाषिये' (Interpreters) की भूमिका निभाने के लिए की गई थी और यह अपेक्षित था कि यही वर्ग क्षेत्रीय भाषाओं को परिष्कृत करेगा, जिससे पश्चिमी विज्ञान एवं साहित्य का सीमित ज्ञान आम जनता तक पहुंचेगा। मैकाले को पूर्ण विश्वास था कि सीमित वित्तीय संसाधनों के साथ जनसामान्य को शिक्षित करने का प्रयास करना असंभव होगा। अतः उसने 1835 के अपने स्मरण पत्र में निस्यंदन के सिद्धांत का समर्थन करते हुए लिखा कि “इस समय हमें एक ऐसे वर्ग का निर्माण करने का पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए जो हमारे और उन लोगों के बीच दुभाषिये का काम करें, जिन पर हम शासन करते हैं”।
यद्यपि भारत में पाश्चात्य शिक्षा का पूर्ण प्रसार नहीं हुआ, तथापि आधुनिक विचार जनसामान्य तक अनिवार्य रूप से पहुंच गए। शासकों द्वारा वांछित माध्यमों इनका प्रसार से करने बजाय राजनीतिक दलों, समाचार-पत्रों, पुस्तिकाओं एवं सार्वजनिक मंचों के माध्यम से हुआ। आधुनिक शिक्षा ने इस प्रक्रिया में राष्ट्रवादियों तक भौतिक एवं सामाजिक विज्ञान का आधारभूत साहित्य उपलब्ध कराकर सहायक की भूमिका निभाई, जिससे भारतीयों में सामाजिक विश्लेषण की क्षमता जागृत हुई, जबकि आधुनिक शिक्षा की विषय-वस्तु, संरचना एवं पाठ्यक्रम मुख्य रूप से औपनिवेशिक हितों के पोषण हेतु ही अभिकल्पित थे।



