मिश्रित अर्थव्यवस्था एक ऐसी विशिष्ट आर्थिक प्रणाली को संदर्भित करती है जहां राज्य के नियामक हस्तक्षेप और बाजार की शक्तियों के बीच संतुलित समन्वय पाया जाता है। इस व्यवस्था के अंतर्गत सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र परस्पर प्रतिस्पर्धी होने के बजाय एक-दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते हैं। जहां एक ओर सरकार लोक कल्याण और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने हेतु रणनीतिक महत्व के आधारभूत क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाती है, वहीं दूसरी ओर आर्थिक दक्षता और नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए निजी उद्यमों को परिचालन की स्वतंत्रता प्रदान की जाती है। इस प्रकार, यह प्रणाली पूंजीवाद की कार्यकुशलता और समाजवाद के समतावादी लक्ष्यों का एक 'मध्यम मार्ग' प्रस्तुत करती है।
मिश्रित अर्थव्यवस्था की विशेषताएं
- सरकारी तथा निजी क्षेत्र के बीच सुस्पष्ट विभाजन, जिसके अंतर्गत आधारभूत तथा सामरिक क्षेत्रों पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहता है।
- बाजार अर्थव्यवस्था तथा नियोजन प्रणाली के बीच एक संतुलन बना रहता है।
- निजी क्षेत्र में निर्णय प्रक्रिया लाभ से प्रभावित होती है, जबकि सरकारी क्षेत्र निवेश हेतु आर्थिक स्थिरता के मापदंडों और सामाजिक लागत एवं लाभ के विश्लेषण पर आधारित होता है।
- विकास, सामाजिक समानता जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सरकार द्वारा योजनाएं और नीतियां बनाई जाती हैं तथा निजी क्षेत्र को नियामक ढांचे द्वारा निर्देशित सामाजिक कल्याण के लक्ष्यों के साथ संरेखण करना पड़ता है।
- इस प्रणाली में सरकार रोजगार, विकास और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए निजी उद्यमिता को प्रोत्साहन देने के साथ ही अनुकूल परिवेश का निर्माण करती है।
- यद्यपि निजी क्षेत्र उत्पादन एवं कीमतों का निर्धारण कर सकता है, तथापि सरकार आवश्यकतानुसार उपभोक्ताओं तथा कमजोर समूहों की सहायता हेतु इसमें हस्तक्षेप कर सकती है।
1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित थी, जहां अत्यंत निम्न उत्पादकता के साथ ही औद्योगिक पिछड़ापन चरम पर था। इस स्थिति से उबरने के लिए औद्योगीकरण को बढ़ावा देना, आय असमानताओं को कम करना तथा सभी क्षेत्रों का विकास करना अत्यावश्यक था। अतः इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु स्वतंत्र भारत की पहली सरकार द्वारा मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाने का निर्णय लिया गया, जिसका श्रेय देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को दिया जाता है जिन्होंने राष्ट्र निर्माण हेतु अर्थव्यवस्था के रणनीतिक क्षेत्रों, जैसे—लोहा, इस्पात, कोयला, तेल, रेलवे और दूरसंचार, पर राज्य के प्रभावी नियंत्रण को अनिवार्य माना। कृषि, व्यापार और उद्योग का अधिकांश भाग निजी हाथों में दे दिया गया। सरकार द्वारा प्रमुख भारी उद्योगों को नियंत्रित किया गया, औद्योगिक अवसंरचना का निर्माण किया गया; व्यापार को विनियमित किया गया; और कृषि में कुछ महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किए गए।
मिश्रित अर्थव्यवस्था की संस्थागत आधारशिला वर्ष 1950 में योजना आयोग के गठन और 1951 में पंचवर्षीय योजनाओं के सूत्रपात के साथ सुदृढ़ हुई। इस मॉडल के अंतर्गत नियोजन को संतुलित क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित करने, संसाधनों की बर्बादी रोकने और आर्थिक विकास को व्यापक सामाजिक उद्देश्यों के साथ समन्वित करने के एक अपरिहार्य माध्यम के रूप में स्वीकार किया गया। इस ढांचे में राज्य ने प्राथमिक क्षेत्रों को चिह्नित कर निवेश को वांछित दिशा प्रदान करने में नियामक की भूमिका निभाई।
निष्कर्षतः, भारत के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था का मॉडल एक व्यावहारिक और दूरदर्शी रूपरेखा थी। यद्यपि इस मॉडल ने भारत के बुनियादी औद्योगिक और संस्थागत ढांचे के निर्माण में युगांतकारी भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्र ने इस्पात, इंजीनियरिंग, औषधि, अंतरिक्ष अनुसंधान और परमाणु ऊर्जा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय क्षमताएं अर्जित कीं। साथ ही, उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों के व्यापक विस्तार ने अर्थव्यवस्था को कृषि पर निर्भरता से मुक्त कर एक आधुनिक औद्योगिक राज्य की सुदृढ़ नींव प्रदान की, तथापि अत्यधिक विनियामक नियंत्रण के कारण कालांतर में नौकरशाही की जटिलता, प्रशासनिक अक्षमता और भ्रष्टाचार जैसी चुनौतियां भी उत्पन्न हुईं, जिन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के कई उपक्रमों की उत्पादकता और प्रबंधन को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया।



