भारत में औपनिवेशिक काल के दौरान आधुनिक उद्योगों—विशेषकर कपास, वस्त्र, पटसन (जूट), खनन और बागान क्षेत्रों—के विस्तार की प्रतिक्रिया के रूप में कारखाना विधानों का क्रमिक विकास हुआ। इस विधायी विकास की प्रकृति, मुख्य रूप से औपनिवेशिक आर्थिक प्राथमिकताओं, भारतीय राष्ट्रवादियों के निरंतर दबाव, मानवीय सरोकारों और अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के जटिल अंतर्संबंधों द्वारा निर्धारित की गई थी।
हालांकि, भारत में कारखाना विधानों का स्वरूप संरक्षणात्मक था, किंतु इसका वास्तविक दायरा अत्यंत सीमित था। जैसा कि 1881 के प्रथम भारतीय कारखाना अधिनियम का मुख्य उद्देश्य श्रमिकों के व्यापक अधिकारों को सुनिश्चित करने के बजाय मुख्य रूप से महिलाओं और बच्चों की कार्यदशाओं को विनियमित करना था। इस अधिनियम के तहत बाल श्रम (7 वर्ष से कम उम्र के बालकों) को प्रतिबंधित किया गया। 7-12 वर्ष के बाल श्रमिकों के लिए कार्य के घंटे निश्चित किए गए, और सुरक्षा के कुछ प्राथमिक प्रावधान किए गए। तत्पश्चात, भारतीय कारखाना अधिनियम, 1891 लागू किया गया जिसके तहत बाल श्रमिकों की न्यूनतम आयु 9 वर्ष तथा अधिकतम आयु 12 वर्ष से बढ़ाकर 14 वर्ष कर दी गई। उनके कार्य घंटों, जो पहले 9 घंटे प्रतिदिन थे, को घटाकर 7 घंटे प्रतिदिन कर दिया गया। इसके अलावा, इस अधिनियम में महिलाओं के लिए भी कार्य के समय को 11 घंटे कर दिया गया, जिसमें एक घंटे का भोजनावकाश/मध्यावकाश भी शामिल था। यद्यपि, वयस्क पुरुष श्रमिकों को इस अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया, जो पूंजीवादी उत्पादन में हस्तक्षेप करने के प्रति औपनिवेशिक शासन की अंतर्निहित अनिच्छा को दर्शाता है। इस प्रकार, यह अधिनियम स्वरूप में सुधारवादी प्रतीत होता था, किंतु अपने वास्तविक क्रियान्वयन और औपनिवेशिक हितों के संदर्भ में मूलतः रूढ़िवादी था।
यद्यपि इन अधिनियमों को बाल एवं महिला श्रमिकों की कार्यदशाओं में सुधार के उद्देश्य से लागू किया गया था, तथापि इन नियमों को अंग्रेजों के स्वामित्व वाले चाय एवं कहवा (कॉफी) बागानों में लागू नहीं किया गया, जहां मजदूरों का निर्दयतापूर्ण शोषण किया जाता था तथा उनकी स्थिति दासों के समान थी। इसके परिणामस्वरूप, ये अधिनियम वास्तविक श्रमिक कल्याण के स्थान पर साम्राज्यवादी आर्थिक हितों की पूर्ति के साधन मात्र बनकर रह गए। इसके अतिरिक्त, इन विधानों के कमजोर प्रवर्तन तंत्र, कारखाना निरीक्षकों की अत्यधिक कमी और दंड के न्यूनतम प्रावधानों ने इनकी व्यावहारिक प्रभावशीलता को अत्यंत सीमित कर दिया।
समय के साथ, भारतीय कारखाना विधान की प्रकृति उत्तरोत्तर व्यापक और संस्थागत स्वरूप धारण करती गई। 1911, 1922 और विशेष रूप से 1934 के कारखाना अधिनियमों के माध्यम से विधायी दायरे का विस्तार किया गया, जिसमें वयस्क पुरुष श्रमिकों को शामिल करने के साथ-साथ उनके कार्य घंटों का विनियमन, विश्राम अंतराल, स्वच्छता, वायु संचार (Ventilation) और सुरक्षा उपायों जैसे प्रावधान किए गए। कारखानों के अनिवार्य निरीक्षण की व्यवस्था ने श्रम प्रशासन में प्रशासनिक निरीक्षण की ओर एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में चिह्नित किया, हालांकि संसाधनों के अभाव और औपनिवेशिक उदासीनता के कारण इनका व्यावहारिक कार्यान्वयन निरंतर असमान और त्रुटिपूर्ण बना रहा।



