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हिंदू कोड बिल या हिंदू संहिता 1950 के दशक के प्रारंभिक काल में प्रस्तुत भारतीय विधियों का एक व्यापक समुच्चय था, जिसके समर्थक तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एवं विधि मंत्री डॉ. बी.आर. अंबेडकर थे। इन विधेयकों का प्राथमिक उद्देश्य हिंदुओं के विवाह, विवाह-विच्छेद, उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार तथा अन्य संबद्ध विषयों से संबंधित विभिन्न कानूनों को एकीकृत, संहिताबद्ध तथा आधुनिक स्वरूप प्रदान करना था। इन विधायी सुधारों का अंतर्निहित लक्ष्य प्रत्येक स्तर पर लैंगिक समानता सुनिश्चित करना था, जिसके अंतर्गत महिलाओं को संपत्ति, विवाह-विच्छेद और उत्तराधिकार के क्षेत्रों में समान अधिकार प्रदान किए गए। इसने विवाह व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार करते हुए एकविवाह प्रथा (Monogamy) को अनिवार्य कर दिया, अंतर-जातीय विवाहों को वैधानिक स्वीकृति दी तथा जाति-आधारित संकीर्ण परंपराओं का उन्मूलन किया। अंततः, इन विधेयकों ने विभिन्न धार्मिक प्रथाओं के स्थान पर हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों और सिखों के लिए एक साझा विधिक ढांचा स्थापित किया।

किंतु इन विधेयकों को रूढ़िवादी वर्गों तथा कांग्रेस के कुछ परिवर्तन विरोधी सदस्यों के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा, जिसके कारण इनके पारित होने की प्रक्रिया में विलंब हुआ। निरंतर विरोध और विधेयक को संसद से पारित न कराए जा सकने की स्थिति में, डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने वर्ष 1951 में मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया, जैसा कि उन्होंने इस असफलता को लोकतांत्रिक मूल्यों तथा महिलाओं के अधिकारों के प्रति एक गंभीर विश्वासघात माना। इसके उपरांत मूल हिंदू कोड विधेयक को विभाजित कर पुनः प्रस्तुत किया गया और अंततः 1955 से 1958 के मध्य चार पृथक एवं ऐतिहासिक अधिनियमों—हिन्दू विवाह अधिनियम (1955), हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम (1956), हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम (1956), तथा हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम (1956)—के रूप में पारित किया गया।

 

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