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भारतीय पुनर्जागरण उन्नीसवीं शताब्दी में घटित उस व्यापक बौद्धिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन की प्रक्रिया था, जिसने औपनिवेशिक अधीनता की परिस्थितियों में भारतीय समाज को गहरे आत्मविश्लेषण के लिए बाध्य किया। इस परिवर्तन के केंद्र में एक नवोदित, शिक्षित भारतीय मध्यम वर्ग था, जिसने तर्कवाद और मानवतावाद जैसे आधुनिक मूल्यों को आत्मसात कर समाज में सुधारवादी चेतना तथा राष्ट्रीय आत्मबोध के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई।

भारतीय मध्यम वर्ग का अभ्युदय तत्कालीन औपनिवेशिक प्रशासनिक संरचना, आर्थिक पुनर्गठन तथा शैक्षणिक प्रतिमानों में आए क्रांतिकारी परिवर्तनों की एक तार्किक परिणति था। विशेषकर 1835 के मैकाले के स्मरण पत्र के उपरांत पाश्चात्य शिक्षा पद्धति के संस्थागत प्रसार ने समाज में एक नवीन प्रबुद्ध वर्ग को जन्म दिया, जो क्लर्कों, शिक्षकों, अधिवक्ताओं, पत्रकारों, चिकित्सकों एवं अधीनस्थ प्रशासकों के रूप में कार्यबल का मुख्य आधार बना। यह नवीन सामाजिक समूह अपनी शहरी अवस्थिति, नियमित वेतनभोगी स्वरूप और आर्थिक स्थिरता के कारण पारंपरिक सामंती अभिजात वर्ग तथा विपन्न ग्रामीण जनमानस के मध्य एक सेतु के रूप में उभरा, जिसने अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की।

इस नवोदित प्रबुद्ध वर्ग पर पाश्चात्य उदारवादी दर्शनों—तर्कवाद, व्यक्तिगत अधिकारों, समानता और वैज्ञानिक चिंतन—का गहरा प्रभाव पड़ा। इसके परिणामस्वरूप भारतीय सामाजिक-धार्मिक परंपराओं की आलोचनात्मक समीक्षा आरंभ हुई, जिसने अनेक सुधार आंदोलनों को जन्म दिया। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले तथा स्वामी विवेकानंद जैसे विचारकों ने सती प्रथा, जाति-आधारित असमानताओं और महिला शिक्षा की उपेक्षा जैसी समस्याओं को चुनौती दी। इन प्रयासों के समानांतर भारतीय संस्कृति और दर्शन के पुनरुत्थान के प्रयास भी किए गए। वस्तुतः उदारवादी पाश्चात्य विचारों और भारतीय परंपरागत मूल्यों का यह वैचारिक समन्वय ही भारतीय पुनर्जागरण की आधारशिला बना।

मुद्रण संस्कृति, समाचार पत्रों, संस्थागत मंचों तथा वाद-विवाद समितियों के प्रसार में भारतीय मध्यम वर्ग ने निर्णायक भूमिका निभाई, जिससे सार्वजनिक विमर्श का दायरा उल्लेखनीय रूप से विस्तृत हुआ। ब्रह्म समाज, आर्य समाज और प्रार्थना समाज जैसी संस्थाओं ने इस वर्ग के नेतृत्व और उसकी वैचारिक सोच को दर्शाया। साथ ही, औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत हो रहे आर्थिक शोषण और नस्लीय भेदभाव के प्रति इस वर्ग की चेतना क्रमशः प्रखर होती गई।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक, भारतीय मध्यम वर्ग प्रारंभिक राष्ट्रवाद की धुरी के रूप में स्थापित हुआ। इसने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया और संवैधानिक सुधारों, नागरिक अधिकारों तथा स्वशासन की मांगों को स्पष्ट रूप से स्वर दिया।

 

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