लॉर्ड ऑकलैंड, जो 1836 में भारत के गवर्नर-जनरल के रूप में भारत आया, अग्रवर्ती नीति (Forward Policy) का समर्थक था। इस नीति का तात्पर्य था कि कंपनी सरकार स्वयं पहल कर रूस के संभावित आक्रमण से ब्रिटिश भारत की सीमाओं को सुरक्षित करे। इस उद्देश्य को या तो पड़ोसी देशों के साथ संधि कर या कंपनी शासन में उनका पूर्ण विलय कर प्राप्त किया जा सकता था। उस समय अफगानिस्तान का अमीर, दोस्त मोहम्मद, अंग्रेजों के साथ मित्रता करने के पक्ष में था, किंतु इसके लिए उसने अंग्रेजों के सामने सिखों से पेशावर वापस दिलाने की शर्त रखी, जिसे भारत की ब्रिटिश सरकार ने अस्वीकार कर दिया। परिणामस्वरूप, दोस्त मोहम्मद ने सहायता हेतु रूस और फारस (Persia) का रुख किया। इस घटना ने अंग्रेजों को अपनी अग्रवर्ती नीति पर तीव्रता से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जिसके फलस्वरूप 1838 में अंग्रेजों, सिखों और शाह शुजा (जो 1809 में अफगान सिंहासन से अपदस्थ किए जाने के बाद से ब्रिटिश पेंशनभोगी के रूप में लुधियाना में निवास कर रहा था) के मध्य एक 'त्रिपक्षीय संधि' (Tripartite Treaty) हुई।
इस संधि में प्रावधान थे कि:
- शाह शुजा को सिखों की सशस्त्र सहायता से सिंहासन पर पुनः स्थापित किया जाएगा, जबकि कंपनी पृष्ठभूमि में रहते हुए केवल धन उपलब्ध कराने की भूमिका निभाएगी;
- शाह शुजा अपने वैदेशिक मामलों का संचालन सिखों और अंग्रेजों के परामर्श के अनुसार करेगा;
- शाह शुजा एक बड़ी धनराशि के बदले सिंध के अमीरों पर अपने संप्रभु अधिकारों का परित्याग करेगा; और
- शाह शुजा सिंधु नदी के दाहिने तट पर स्थित अफगान क्षेत्रों पर सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह के दावों को मान्यता प्रदान करेगा।
1838 की त्रिपक्षीय संधि के पश्चात, क्षेत्रीय भू-राजनीतिक परिदृश्य में आमूल-चूल परिवर्तन देखा गया, क्योंकि जिन मूल कारणों से तनाव उत्पन्न हुआ था, उनका समाधान हो गया था—फारस ने हेरात की घेराबंदी हटा ली थी और रूस ने काबुल से अपना दूत वापस बुला लिया था। इन अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद, ब्रिटिश सरकार ने अपनी अग्रवर्ती नीति पर आगे बढ़ने का निर्णय लिया जिसका परिणाम प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1839-42) के रूप में सामने आया। इस सैन्य हस्तक्षेप के पीछे ब्रिटिश साम्राज्य का अंतर्निहित उद्देश्य उत्तर-पश्चिमी सीमांत से उत्पन्न होने वाली आक्रामक योजनाओं के विरुद्ध एक स्थायी अवरोध स्थापित करना था।



